Electricity Bill : बिजली उपभोक्ताओं को झटका, नई नीति से अब हर साल बढ सकते हैं बिजली के बिल, जानें क्या है Index Linked Tariff ?
केंद्र सरकार की नई राष्ट्रीय विद्युत नीति (एनईपी) का मसौदा बिजली उपभोक्ताओं के लिए चिंता बढ़ाने वाला साबित हो सकता है । मसौदे के मुताबिक, अगले वित्तीय वर्ष 2026-27 से देशभर में बिजली का बिल हर साल ऑटोमैटिक तरीके से बढ़ने की संभावना है ।

Electricity Bill : जल्द ही देश में बिजली बिल को लेकर एक नया नियम बन सकता है जिसके बाद देश में बिजली के बिल हर साल अपने आप बढेंगे । अगर ये नियम बना तो वोट के चक्कर में ना बढने वाले बिजली के दाम अपने आप बढेंगे जिसका सीधा सीधा असर आम जनता पर पड़ने वाला है ।
केंद्र सरकार की नई राष्ट्रीय विद्युत नीति (एनईपी) का मसौदा बिजली उपभोक्ताओं के लिए चिंता बढ़ाने वाला साबित हो सकता है । मसौदे के मुताबिक, अगले वित्तीय वर्ष 2026-27 से देशभर में बिजली का बिल हर साल ऑटोमैटिक तरीके से बढ़ने की संभावना है । सरकार ने इसमें इंडेक्स-लिंक्ड टैरिफ व्यवस्था का प्रस्ताव दिया है, जिससे बिजली की कीमतें महंगाई और लागत से सीधे जुड़ जाएंगी ।

क्या है इंडेक्स-लिंक्ड टैरिफ सिस्टम? (Index Linked Tariff)
नई नीति के अनुसार, अगर राज्य बिजली नियामक आयोग (State Electricity Regulatory Commission) समय पर बिजली दरें तय नहीं करते हैं, तो एक तय फॉर्मूले के आधार पर बिजली की दरें अपने-आप बढ़ जाएंगी। यानी अब राजनीतिक कारणों से सालों तक टैरिफ न बढ़ने की स्थिति खत्म हो सकती है।
मसौदे में साफ कहा गया है कि बिजली की कीमतों को किसी सूचकांक (जैसे महंगाई दर, कोयले की कीमत, बिजली उत्पादन लागत) से जोड़ा जाएगा। जैसे ही बिजली बनाने या सप्लाई करने की लागत बढ़ेगी, उसी अनुपात में उपभोक्ताओं का बिल भी बढ़ सकता है।
हर महीने बढ़ सकता है बिल !
नीति में यह भी प्रस्ताव है कि बिजली वितरण कंपनियां (DISCOM) हर महीने बिजली खरीद लागत में बदलाव की जानकारी उपभोक्ताओं को दें। इसके अलावा, लागत में उतार-चढ़ाव को संभालने के लिए स्थिरीकरण कोष (Stabilisation Fund) बनाने की सिफारिश की गई है। इसका मतलब साफ है कि अब महीने-दर-महीने बिजली बिल में बदलाव देखने को मिल सकता है। (Haryana News)
सब्सिडी पर भी पड़ेगी मार
गौरतलब है कि संसद के आगामी बजट सत्र में बिजली (संशोधन) विधेयक पेश किया जा सकता है। इसमें बिजली क्षेत्र में दी जा रही सब्सिडी को धीरे-धीरे कम करने का प्रस्ताव भी शामिल है। इसका सबसे सीधा असर घरेलू और कृषि उपभोक्ताओं पर पड़ सकता है।
आंकड़ों के मुताबिक, देश की करीब 45 फीसदी बिजली खपत घरेलू और कृषि उपभोक्ताओं की है। फिलहाल कई राज्यों में बिजली सप्लाई की औसत लागत करीब 6.8 रुपये प्रति यूनिट है, लेकिन उपभोक्ताओं से इससे कम वसूली की जाती है। नई नीति में इस अंतर को खत्म करने की बात कही गई है। (India News)
बिजली कंपनियों के घाटे पर लगेगी लगाम
सरकारी रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2023 में बिजली वितरण कंपनियों का औसत राजस्व अंतर करीब 0.5 रुपये प्रति यूनिट रहा। हालांकि, वित्त वर्ष 2025 में पहली बार करीब 2,700 करोड़ रुपये का मुनाफा दर्ज किया गया है। पहले जहां प्रति यूनिट 48 पैसे का घाटा होता था, वह घटकर 6 पैसे रह गया है।

वर्तमान में बिजली कंपनियों का सरकार पर करीब 3 लाख करोड़ रुपये का बकाया है। नई नीति का मकसद यही बताया गया है कि वास्तविक लागत की भरपाई हो सके और कंपनियां लगातार घाटे में न जाएं। (Smart Meter)
उद्योगों को महंगी, घरों को सस्ती बिजली
भारत में बिजली की कीमतों का बोझ उद्योगों पर ज्यादा है। भारतीय उद्योग दुनिया में सबसे महंगी बिजली खरीदते हैं, क्योंकि उनसे ज्यादा वसूली कर घरेलू और कृषि उपभोक्ताओं को सब्सिडी दी जाती है। देश की मौजूदा बिजली उत्पादन क्षमता 509 गीगावॉट है और मांग हर साल करीब 4 फीसदी की दर से बढ़ रही है, जो 2032 तक दोगुनी हो सकती है। (Bijli Bill)

उपभोक्ताओं के लिए क्या मतलब?
हर साल बिजली बिल में बढ़ोतरी की संभावना
महीने-दर-महीने बिल में बदलाव संभव
घरेलू और कृषि उपभोक्ताओं पर सीधा असर
सब्सिडी में कटौती का खतरा
केंद्र सरकार ने इस ड्राफ्ट नीति पर सभी हितधारकों से 30 दिनों के भीतर सुझाव और आपत्तियां मांगी हैं। यह मसौदा विद्युत मंत्रालय (Ministry of Power) द्वारा जारी किया गया है। अगर यह नीति लागू होती है, तो आने वाले वर्षों में बिजली उपभोक्ताओं की जेब पर अतिरिक्त बोझ पड़ना तय माना जा रहा है।











